हमारा पर्यावरण

11/26/20241 min read

हमारा पर्यावरण

पर्यावरण

पर्यावरण वह भौतिक तथा जैविक संसार है जिसमें हम रहते हैं। पर्यावरण जीवों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करने वाली समस्त भौतिक, अजैविक तथा जैविक परिस्थितियों का योग है।

जैवनिम्नीकरणीय (Biodegradable):

  • परिभाषा: जैवनिम्नीकरणीय वह पदार्थ होते हैं जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से, जैसे बैक्टीरिया, कवक, या अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा, विघटित (decompose) हो सकते हैं।

  • उदाहरण: खाद्य पदार्थ, लकड़ी, पत्तियाँ, कागज, बायोप्लास्टिक आदि।

  • महत्व: ये पदार्थ पर्यावरण को कम हानि पहुँचाते हैं क्योंकि वे समय के साथ प्राकृतिक तरीके से नष्ट हो जाते हैं और इस प्रक्रिया में प्रदूषण का स्तर कम होता है।

गैर-जैवनिम्नीकरणीय (Non-Biodegradable):

  • परिभाषा: गैर-जैवनिम्नीकरणीय पदार्थ वे होते हैं जो प्राकृतिक तरीके से आसानी से विघटित नहीं होते हैं और लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं।

  • उदाहरण: प्लास्टिक, धातु, कांच, और रासायनिक पदार्थ।

  • महत्व: इन पदार्थों का प्रदूषण बहुत गंभीर हो सकता है क्योंकि वे लंबे समय तक नष्ट नहीं होते, जिससे पर्यावरण में जमा हो जाते हैं और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

पारितंत्र

पारितंत्र एक जैविक और अजैविक घटकों का समूह होता है, जो एक-दूसरे के साथ परस्पर क्रियावली (परस्पर क्रिया) करते हैं और मिलकर एक संतुलित वातावरण का निर्माण करते हैं। यह जीवों (जैविक घटक) और उनके वातावरण (अजैविक घटक) के बीच रिश्तों का जटिल नेटवर्क है।

पारितंत्र के घटक:

  1. जैविक घटक:

    • ये वे जीव होते हैं जो जीवन के विभिन्न रूपों में भाग लेते हैं, और इनमें उत्पादक, उपभोक्ता, और अपघटक शामिल होते हैं।

    • उत्पादक: ये वे जीव होते हैं जो सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा प्राप्त करके अपना भोजन तैयार करते हैं, जैसे पौधे और कुछ प्रकार के बैक्टीरिया।

    • उपभोक्ता: ये जीव उत्पादकों या अन्य जीवों को खाते हैं। इन्हें प्रमुख रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है:

      • प्रथम श्रेणी: शाकाहारी जो पौधों को खाते हैं।

      • द्वितीय श्रेणी: मांसाहारी जो शाकाहारी जीवों को खाते हैं।

      • तृतीय श्रेणी: उच्चतम मांसाहारी जो अन्य मांसाहारी जीवों को खाते हैं।

    • अपघटक: ये जीव (जैसे बैक्टीरिया और कवक) मृत जीवों के शरीर को तोड़ते हैं और उन्हें पोषक तत्वों में बदलकर मृदा में वापस छोड़ देते हैं।

  2. अजैविक घटक:

    • ये पर्यावरण के वे तत्व होते हैं जो जीवों से संबंधित नहीं होते, लेकिन जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं। इनमें हवा, पानी, मृदा, सूर्य का प्रकाश, तापमान, और खनिज तत्व शामिल होते हैं।

पारितंत्र के प्रकार:

  1. स्थलीय पारितंत्र: ये पारितंत्र भूमि पर होते हैं, जैसे जंगल, घास के मैदान, मरुस्थल, और पर्वतीय पारितंत्र।

  2. जल पारितंत्र: ये पारितंत्र जल से संबंधित होते हैं, जैसे मीठे पानी के पारितंत्र (नदियाँ, झीलें) और खारे पानी के पारितंत्र (समुद्र, महासागर)

पारितंत्र के कार्य:

  • ऊर्जा का प्रवाह: सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर उत्पादक उसे रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं, जिसे उपभोक्ता खाकर उपयोग करते हैं।

  • पोषक तत्वों का चक्र: यह पारितंत्र में पोषक तत्वों की पुनः प्राप्ति और वितरण को सुनिश्चित करता है, जैसे नाइट्रोजन चक्र, जल चक्र, और कार्बन चक्र।

  • संतुलन बनाए रखना: पारितंत्र में विभिन्न घटक आपस में संतुलन बनाए रखते हैं, ताकि पर्यावरण में कोई एक तत्व अत्यधिक हो और पूरी प्रणाली सामंजस्यपूर्ण तरीके से काम करे।

पारितंत्र का महत्व:

  • यह प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करता है और जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करता है।

  • पारितंत्र प्रदूषण को नियंत्रित करने, जलवायु को स्थिर रखने और विभिन्न प्रजातियों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उपभोक्ता (Consumers) पारितंत्र में वे जीव होते हैं जो ऊर्जा और पोषक तत्वों के लिए उत्पादकों (जैसे पौधों) या अन्य उपभोक्ताओं पर निर्भर होते हैं। उपभोक्ताओं को उनके आहार और खाने की आदतों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। मुख्यत: उपभोक्ताओं को तीन प्रकारों में बांटा जाता है: शाकाहारी, मांसाहारी, और सर्वाहारी

1. शाकाहारी (Herbivores):

शाकाहारी वे उपभोक्ता होते हैं जो मुख्य रूप से पौधों, पौधों के भागों, और शैवाल (algae) आदि का सेवन करते हैं। ये सीधे उत्पादकों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। शाकाहारी पारितंत्र में निचले स्तर पर होते हैं और अक्सर इनका आहार पौधे और उनके विभिन्न अंग (पत्तियाँ, फूल, फल आदि) होते हैं।

  • उदाहरण:

    • गाय (Cow)

    • बकरी (Goat)

    • हाथी (Elephant)

    • खरगोश (Rabbit)

    • कुछ कीट (Insects) जैसे तितलियाँ

2. मांसाहारी (Carnivores):

मांसाहारी वे उपभोक्ता होते हैं जो अन्य जानवरों का मांस खाते हैं। ये शाकाहारी या अन्य मांसाहारी जानवरों को शिकार कर खाते हैं। मांसाहारी आमतौर पर पारितंत्र के उच्चतम स्तर पर होते हैं और इन्हें द्वितीयक या तृतीयक उपभोक्ता भी कहा जाता है।

  • उदाहरण:

    • शेर (Lion)

    • बाघ (Tiger)

    • गीदड़ (Jackal)

    • शिकारी पक्षी (Predatory Birds) जैसे बाज़ (Eagle)

3. सर्वाहारी (Omnivores):

सर्वाहारी वे उपभोक्ता होते हैं जो दोनोंपौधे और अन्य जानवरदोनों का सेवन करते हैं। इनका आहार विविध होता है और वे शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के खाद्य स्रोतों पर निर्भर होते हैं। सर्वाहारी पारितंत्र में मध्य स्तर पर होते हैं, और ये प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।

  • उदाहरण:

    • मानव (Human)

    • भालू (Bear)

    • सूअर (Pig)

    • मुर्गा (Chicken)

    • चूहे (Rats)

सारांश:

  • शाकाहारी: केवल पौधे खाते हैं।

  • मांसाहारी: केवल मांस खाते हैं।

  • सर्वाहारी: पौधे और मांस दोनों खाते हैं।

ये उपभोक्ता पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखते हैं, और हर एक का पारितंत्र में विशेष कार्य होता है। उपभोक्ताओं का व्यवहार पारितंत्र के संतुलन और जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पारिस्थितिकी तंत्र / पारितंत्र के प्रकार

पारिस्थितिकी तंत्र वह पर्यावरणीय प्रणाली है, जिसमें विभिन्न जीवधारी (जैसे पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव) और उनके परिवेश (जैसे जल, मृदा, वायु) आपस में मिलकर एक-दूसरे पर निर्भर रहते हुए जीवन के विभिन्न क्रियाकलापों को संचालित करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र दो प्रकार के होते हैं:

1. प्राकृतिक पारितंत्र (Natural Ecosystem):

प्राकृतिक पारितंत्र वे पारितंत्र होते हैं जो स्वाभाविक रूप से प्रकृति में उत्पन्न होते हैं। इन पारितंत्रों में सभी जैविक और अजैविक घटक एक-दूसरे के साथ प्राकृतिक तरीके से परस्पर क्रियावली करते हैं। ये पारितंत्र बिना मानव हस्तक्षेप के अस्तित्व में रहते हैं और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हैं।

  • उदाहरण:

    • वन पारितंत्र (Forest Ecosystem)

    • जल पारितंत्र (Aquatic Ecosystem) जैसे महासागर, नदियाँ, झीलें

    • घास के मैदान पारितंत्र (Grassland Ecosystem)

    • मरुस्थल पारितंत्र (Desert Ecosystem)

  • विशेषताएँ:

    • यह प्राकृतिक रूप से संतुलित होता है।

    • जैविक और अजैविक घटकों के बीच स्वाभाविक क्रियावली होती है।

    • इसमें मनुष्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होता है, या बिल्कुल नहीं होता है।

    • जैव विविधता अधिक होती है और यह प्राकृतिक संसाधनों का स्वाभाविक प्रबंधन करता है।

2. कृत्रिम या मानव निर्मित पारितंत्र (Artificial or Human-Made Ecosystem):

कृत्रिम पारितंत्र वे पारितंत्र होते हैं जो मनुष्य द्वारा निर्मित किए जाते हैं। इन पारितंत्रों का निर्माण मानव गतिविधियों के द्वारा किया जाता है, ताकि विशिष्ट उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसे कृषि, जलाशय, उद्यान, या शहरों का विकास।

  • उदाहरण:

    • कृषि पारितंत्र (Agricultural Ecosystem): खेतीबाड़ी, बागवानी आदि।

    • शहरी पारितंत्र (Urban Ecosystem): शहरों और नगरों में मनुष्य द्वारा निर्मित वातावरण।

    • जलाशय पारितंत्र (Reservoir Ecosystem): मानव द्वारा बनाए गए जलाशय और बाँध।

    • पार्क और उद्यान पारितंत्र (Park and Garden Ecosystem): मनुष्य द्वारा बनाए गए बाग-बगिचे और प्राकृतिक क्षेत्र।

  • विशेषताएँ:

    • इन पारितंत्रों का निर्माण मानव की आवश्यकता और सुविधा के अनुसार किया जाता है।

    • जैविक घटक (पौधे, जानवर) और अजैविक घटक (जल, मिट्टी) को नियंत्रित किया जाता है।

    • इनमें प्राकृतिक संतुलन की कमी हो सकती है, क्योंकि मानव हस्तक्षेप इनकी संरचना को प्रभावित करता है।

    • यह प्राकृतिक पारितंत्रों के मुकाबले अधिक संवेदनशील हो सकते हैं और इनमें पर्यावरणीय असंतुलन का खतरा होता है।

1. आहार श्रृंखला (Food Chain):

आहार श्रृंखला वह क्रम है, जिसमें जीव एक दूसरे को खाकर ऊर्जा और पोषक तत्व प्राप्त करते हैं। यह एक सीधी और सरल रेखा में ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाती है। इसमें हर स्तर पर एक उपभोक्ता (कंज्यूमर) दूसरे को खाता है, और यह एक निश्चित दिशा में ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाता है।

आहार श्रृंखला के घटक:

  1. उत्पादक (Producers): ये वे जीव होते हैं जो सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते हैं, जैसे पौधे और शैवाल।

  2. शाकाहारी (Herbivores): ये शाकाहारी उपभोक्ता होते हैं जो उत्पादकों (पौधों) को खाते हैं।

  3. मांसाहारी (Carnivores): ये मांसाहारी उपभोक्ता होते हैं जो शाकाहारी जीवों को खाते हैं।

  4. उच्चतम मांसाहारी (Top Carnivores): ये वे मांसाहारी होते हैं जो अन्य मांसाहारी जीवों को खाते हैं।

उदाहरण:

एक सामान्य आहार श्रृंखला का उदाहरण:

  • सूर्यपौधे (उत्पादक) → घास खाने वाला जीव (शाकाहारी) → मांसाहारी (जो शाकाहारी जीव को खाता है)

यह श्रृंखला बहुत ही सरल और सीधे तरीके से ऊर्जा का प्रवाह दिखाती है, लेकिन वास्तविक पारितंत्र में यह अधिक जटिल होता है।

2. आहार जाल (Food Web):

आहार जाल एक जटिल और विविध प्रणाली है जिसमें विभिन्न आहार श्रृंखलाएँ एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। यह पारितंत्र में सभी जीवों के बीच ऊर्जा और पोषक तत्वों के आपसी संबंधों का विस्तृत चित्रण करता है। एक आहार जाल में बहुत सारी आहार श्रृंखलाएँ एक साथ होती हैं, और एक ही जीव कई अन्य जीवों को अपना आहार बना सकता है।

विशेषताएँ:

  • आहार जाल में कई आहार श्रृंखलाएँ आपस में मिलकर एक जटिल नेटवर्क बनाती हैं।

  • इसमें जीवों के आहार संबंध अधिक विविध होते हैं।

  • आहार जाल पारितंत्र की वास्तविक स्थिति को अधिक सही तरीके से दर्शाता है क्योंकि यह जीवन के जटिल और परस्पर जुड़े हुए पहलुओं को दिखाता है।

उदाहरण:

एक आहार जाल में एक ही शाकाहारी जीव कई मांसाहारी जीवों का आहार बन सकता है, और एक मांसाहारी जीव कई प्रकार के शाकाहारी जीवों को खा सकता है।

उदाहरण के लिए:

  • पौधे (उत्पादक) → शाकाहारी (घास खाने वाले जीव) → मांसाहारी (जो शाकाहारी को खाते हैं)

  • पौधेशाकाहारीमांसाहारीउच्चतम मांसाहारी

वास्तविक जीवन के आहार श्रृंखला के उदाहरण:

  1. वन पारितंत्र:

    • सूर्यपौधे (उत्पादक, जैसे वृक्ष और झाड़ियाँ) → शाकाहारी जीव (प्राथमिक उपभोक्ता, जैसे हिरण, खरगोश) → मांसाहारी जीव (द्वितीयक उपभोक्ता, जैसे लोमड़ी, भेड़िया) → उच्चतम मांसाहारी (तृतीयक उपभोक्ता, जैसे बाघ, भालू)

उदाहरण के लिए, हिरण पौधों को खाते हैं, फिर लोमड़ी हिरण को शिकार करती है, और बाघ लोमड़ी का शिकार करता है।

  1. जल पारितंत्र (तालाब):

    • सूर्यफाइटोप्लांकटन (उत्पादक) → ज़ोप्लांकटन (प्राथमिक उपभोक्ता) → छोटे मछली (द्वितीयक उपभोक्ता) → बड़ी मछली (तृतीयक उपभोक्ता, जैसे बास, पाइक्स)

यहाँ, फाइटोप्लांकटन सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित करके अपना भोजन बनाते हैं, ज़ोप्लांकटन इसे खाते हैं, छोटे मछलियाँ इनका शिकार करती हैं, और फिर बड़ी मछलियाँ इन्हें खाती हैं।

  1. घास के मैदान पारितंत्र:

    • सूर्यघास (उत्पादक) → घास खाने वाले जीव (शाकाहारी, जैसे घोड़े) → शिकार करने वाले जीव (मांसाहारी, जैसे सांप, बाज़)

घास को घोड़े खाते हैं, फिर सांप और बाज़ इन घोड़ों को शिकार करते हैं।

वास्तविक जीवन के आहार जाल के उदाहरण:

  1. उष्णकटिबंधीय वर्षावन पारितंत्र: उष्णकटिबंधीय वर्षावन में बहुत जटिल आहार जाल होता है, जिसमें कई आहार श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिए:

    • उत्पादक: वृक्ष, बेल, और पौधे।

    • प्राथमिक उपभोक्ता: कीट (जैसे बीटल, कैटरपिलर), बंदर, पक्षी।

    • द्वितीयक उपभोक्ता: शिकारी पक्षी (जैसे बाज़, उल्लू), छिपकलियाँ, मेंढक।

    • तृतीयक उपभोक्ता: बाघ, जगुआर, बड़े सांप।

यहाँ, बाघ बंदरों और मेंढकों को शिकार करते हैं, जबकि मेंढक कीटों और छोटे जानवरों का शिकार करते हैं। यह एक जटिल और परस्पर जुड़े हुए आहार जाल को दिखाता है।

  1. समुद्री पारितंत्र: समुद्र के पारितंत्र में भी एक जटिल आहार जाल होता है। उदाहरण के लिए:

    • उत्पादक: फाइटोप्लांकटन (छोटे पौधे), शैवाल।

    • प्राथमिक उपभोक्ता: छोटी मछलियाँ (जैसे एंकोवी), ज़ोप्लांकटन।

    • द्वितीयक उपभोक्ता: बड़ी मछलियाँ (जैसे टूना, सार्डिन), स्क्विड।

    • तृतीयक उपभोक्ता: समुद्री स्तनधारी (जैसे सील, डॉल्फिन), शार्क, बड़ी मछलियाँ।

    • सड़ने वाले जीव: बैक्टीरिया और कवक जो मृत जीवों को विघटित करते हैं।

इस आहार जाल में, फाइटोप्लांकटन सूर्य की ऊर्जा से भोजन बनाते हैं, ज़ोप्लांकटन इसे खाते हैं, फिर छोटी मछलियाँ ज़ोप्लांकटन का शिकार करती हैं, और शार्क या डॉल्फिन इन मछलियों को शिकार करते हैं।

  1. मरुस्थलीय पारितंत्र: मरुस्थल के पारितंत्र में भी आहार जाल होता है, हालांकि यह थोड़ा सरल होता है:

    • उत्पादक: कैक्टस, मरुस्थलीय झाड़ियाँ, घास।

    • प्राथमिक उपभोक्ता: कीट (जैसे टिड्डियाँ), छोटे स्तनधारी (जैसे गिलहरी, चूहे), पक्षी (जैसे स्पैरो)

    • द्वितीयक उपभोक्ता: छिपकली, सांप।

    • तृतीयक उपभोक्ता: बाज़, उल्लू।

इस आहार जाल में, बाज़ और उल्लू सांपों और छिपकलियों को खाते हैं, और सांप छोटे जीवों (जैसे गिलहरी और चूहे) को शिकार करते हैं।

पोषी स्तर

पोषी स्तर (Trophic Level) वह स्तर होता है जिस पर कोई जीव या जीवों का समूह आहार श्रृंखला में स्थित होता है। यह किसी पारितंत्र में ऊर्जा और पोषक तत्वों के प्रवाह को समझने के लिए उपयोगी होता है। आहार श्रृंखला में प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा का वितरण होता है, और हर स्तर पर ऊर्जा का एक हिस्सा दूसरे स्तर में स्थानांतरित होता है।

आहार श्रृंखला में मुख्यतः चार प्रमुख पोषी स्तर होते हैं:

1. प्राथमिक उत्पादक (Primary Producers):

  • ये पौधे और शैवाल होते हैं जो सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते हैं। इनका कार्य ऊर्जा का उत्पादन करना और उसे अपने शरीर में संग्रहित करना होता है। यह प्रथम पोषी स्तर (First Trophic Level) होता है।

  • उदाहरण: पेड़-पौधे, घास, शैवाल, फाइटोप्लांकटन।

2. प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers):

  • ये शाकाहारी जीव होते हैं जो पौधों या शैवाल का सेवन करते हैं। यह दूसरे पोषी स्तर (Second Trophic Level) में होते हैं।

  • उदाहरण: गाय, बकरी, खरगोश, घोड़ा, कीड़े, शाकाहारी मच्छर।

3. द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumers):

  • ये मांसाहारी जीव होते हैं जो शाकाहारी जीवों का शिकार करते हैं। यह तीसरे पोषी स्तर (Third Trophic Level) में होते हैं।

  • उदाहरण: लोमड़ी, सियार, मेंढ़क, सांप, छोटी मछलियाँ।

4. तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumers):

  • ये उच्चतम मांसाहारी होते हैं जो द्वितीयक उपभोक्ताओं का शिकार करते हैं। यह चौथे पोषी स्तर (Fourth Trophic Level) में होते हैं।

  • उदाहरण: शेर, बाघ, ईगल (बाज़), शार्क, जंगली बिल्ली।

5. सर्वोच्च उपभोक्ता (Quaternary Consumers):

  • ये वह जीव होते हैं जो दूसरे मांसाहारी जीवों का शिकार करते हैं और सामान्यत: इनके पास कोई शिकार करने वाला नहीं होता। यह आमतौर पर पारितंत्र के उच्चतम पोषी स्तर पर होते हैं।

  • उदाहरण: मानव (जो शाकाहारी और मांसाहारी दोनों खाते हैं)

पोषी स्तरों में ऊर्जा का प्रवाह:

  • प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा का एक हिस्सा व्यर्थ हो जाता है (ऊर्जा का 90% भाग) और केवल 10% ऊर्जा अगले स्तर पर स्थानांतरित होती है। यह कारण है कि प्रत्येक अगले पोषी स्तर पर जीवों की संख्या कम होती है और ऊर्जा की उपलब्धता भी घटती है।

उदाहरण:

  • सूर्यपौधे (प्राथमिक उत्पादक)घोड़ा (प्राथमिक उपभोक्ता)सांप (द्वितीयक उपभोक्ता)बाघ (तृतीयक उपभोक्ता)

यहाँ ऊर्जा पहले पौधों से घोड़े तक पहुँचती है, फिर घोड़ा सांप का शिकार करता है और अंत में बाघ सांप को खाकर ऊर्जा प्राप्त करता है।

जैव आवर्धक (Biomagnification) एक प्रक्रिया है, जिसमें किसी पारितंत्र में विषैले पदार्थों की सांद्रता (concentration) ऊंचे पोषी स्तरों पर बढ़ती जाती है। जब यह विषैले पदार्थ किसी जीव के शरीर में एकत्र होते हैं, तो वे उसी जीव के आहार श्रृंखला के अन्य जीवों में पहुंचते हैं, और प्रत्येक अगला उपभोक्ता अधिक विषाक्त पदार्थों का शिकार करता है। इसका मुख्य कारण है कि विषैले पदार्थों का शरीर में जमा होना और इनका अपघटन (degradation) बहुत धीमा होना, जिससे यह शरीर में जमा होते जाते हैं।

जैव आवर्धक का कारण:

  • पोषी स्तरों पर विषैले पदार्थों का संचय: जब प्राथमिक उत्पादक (जैसे पौधे या फाइटोप्लांकटन) विषैले पदार्थों (जैसे कीटनाशक, भारी धातु) को अवशोषित करते हैं, तो वे छोटे उपभोक्ताओं द्वारा खाए जाते हैं। ये उपभोक्ता उस विषैले पदार्थ को अपने शरीर में जमा कर लेते हैं। फिर जब इन उपभोक्ताओं को अगले पोषी स्तर के उपभोक्ता खाते हैं, तो वे भी वही विषैले पदार्थ प्राप्त करते हैं, और इस प्रक्रिया में विष का स्तर बढ़ता जाता है।

  • जैविक अपघटन की धीमी दर: कई विषैले पदार्थों का शरीर में अपघटन बहुत धीमा होता है, जैसे पारा, डी.डी.टी. (DDT), और अन्य कीटनाशक। जब ये पदार्थ किसी जीव के शरीर में जमा होते हैं, तो वे उसे छोड़ने या नष्ट करने में असमर्थ होते हैं।

जैव आवर्धक के उदाहरण:

  1. डी.डी.टी. का प्रभाव:

    • डी.डी.टी. (DDT) एक कीटनाशक है, जिसका उपयोग फसलों और मच्छरों को नष्ट करने के लिए किया जाता था। जब यह पानी, मिट्टी और पौधों में समाहित होता है, तो यह छोटे जीवों (जैसे कीड़े, मच्छर) द्वारा खाया जाता है। फिर इन छोटे जीवों को मछलियाँ और पक्षी खाते हैं। इस प्रक्रिया में डी.डी.टी. की सांद्रता बढ़ जाती है, और अंततः बड़े मांसाहारी (जैसे ईगल या हॉक) तक पहुँच जाती है, जहाँ इसकी सांद्रता इतनी अधिक हो सकती है कि इन जीवों के अंडे पतले हो जाते हैं और फूटने से पहले ही टूट जाते हैं।

  2. पारा का प्रभाव:

    • पारा (Mercury) एक भारी धातु है, जो जल में आसानी से समाहित हो जाता है और जल पारितंत्र में फैल सकता है। यह छोटे जलजीवों द्वारा अवशोषित किया जाता है, और फिर उच्चतम पोषी स्तर पर जैसे मछलियों और समुद्री स्तनधारियों (जैसे व्हेल, डॉल्फिन) में जमा हो जाता है। जब मानव इन मछलियों को खाते हैं, तो वे भी पारे से प्रभावित होते हैं। यह मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है, जैसे न्यूरोलॉजिकल समस्याएँ और गुर्दे की बीमारियाँ।

  3. कार्बनिक प्रदूषक (PCBs):

    • पॉलिक्लोरिनेटेड बाइफिनाइल (PCBs) एक प्रकार का कार्बनिक प्रदूषक है, जो जल, हवा और मिट्टी में फैल सकता है। यह भी जैव आवर्धन की प्रक्रिया में शामिल होता है। यह पदार्थ पानी में रहने वाले जीवों (जैसे मछलियाँ, शैवाल) द्वारा अवशोषित होते हैं और फिर इसे खाकर बड़े मांसाहारी जीवों तक पहुँचता है।

जैव आवर्धन के प्रभाव:

  1. पारिस्थितिकी/ पारितंत्र तंत्र में असंतुलन: जैव आवर्धन के कारण विषैले पदार्थों का संचय पारितंत्र में असंतुलन पैदा कर सकता है। यदि किसी जीव की आबादी अत्यधिक प्रभावित होती है, तो पूरे पारितंत्र में ऊर्जा के प्रवाह और खाद्य श्रृंखला पर असर पड़ सकता है।

  2. स्वास्थ्य पर असर: जैव आवर्धन से मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, पानी में पारे की अधिकता से मछलियाँ खाने वाले लोगों को तंत्रिका तंत्र से संबंधित बीमारियाँ हो सकती हैं।

जैव आवर्धक से बचाव के उपाय:

  • प्रदूषण नियंत्रण: प्रदूषण को नियंत्रित करना और खतरनाक रसायनों का उपयोग कम करना।

  • सतत कृषि प्रथाएँ: जैविक कीटनाशकों और प्राकृतिक विधियों का उपयोग करने से जैविक प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

  • विषैले पदार्थों का निस्तारण: विषैले रसायनों का उचित तरीके से निस्तारण और पुनः उपयोग।

सारांश:

जैव आवर्धक एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विषैले पदार्थ धीरे-धीरे पोषी स्तरों के माध्यम से अधिक सांद्रित होते जाते हैं। इससे पारितंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और जीवों के स्वास्थ्य के लिए यह हानिकारक साबित हो सकता है। जैव आवर्धक से बचने के लिए प्रदूषण को नियंत्रित करने और सतत प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता है।

ओज़ोन परत (Ozone Layer)

ओज़ोन परत पृथ्वी के वातावरण में एक पतली परत है, जो ओज़ोन (O₃) गैस से बनी होती है। यह परत पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित होती है, और इसका मुख्य कार्य सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित करना और पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखना है। ओज़ोन परत पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पराबैंगनी विकिरण को नियंत्रित करती है।

ओज़ोन परत का कार्य:

1. सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करना: ओज़ोन परत सबसे अधिक UV-B और UV-C किरणों को अवशोषित करती है। यह किरणें त्वचा कैंसर, दृष्टि संबंधी समस्याएँ, और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न कर सकती हैं। ओज़ोन परत इन हानिकारक किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकती है।

2. जीवों को सुरक्षा प्रदान करना: ओज़ोन परत की रक्षा के कारण, पृथ्वी पर जीवन को आवश्यक मात्रा में सूर्य का प्रकाश मिलता है, लेकिन अत्यधिक हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से बचाव भी होता है। यह मनुष्यों, जानवरों और पौधों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

3. जलवायु और मौसम को नियंत्रित करना: ओज़ोन परत का तापमान पर भी असर पड़ता है। यह परत वातावरण के विभिन्न हिस्सों में तापमान को संतुलित बनाए रखने में मदद करती है, जिससे जलवायु और मौसम की स्थितियाँ स्थिर रहती हैं।

ओज़ोन परत का अवक्षय (Ozone Layer Depletion)

ओज़ोन परत का अवक्षय एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ओज़ोन गैस की सांद्रता (concentration) में कमी आती है। यह प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों द्वारा हो सकता है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या मानव-निर्मित रसायनों द्वारा उत्पन्न होती है, जो ओज़ोन परत को नष्ट कर देते हैं।

ओज़ोन परत के अवक्षय के कारण:

1. CFCs (क्लोरोफ्लोरोकार्बन): क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) मुख्य रूप से वायु शीतलन प्रणालियों (ACs), रेफ्रिजरेटर, और ब्यूटेन या प्रोपेन जैसे रसायनों में पाए जाते थे। जब CFCs वातावरण में प्रवेश करते हैं, तो ये ओज़ोन अणुओं के साथ प्रतिक्रिया करते हैं और ओज़ोन को नष्ट करते हैं।

2. HCFCs और HFCs: हालांकि, CFCs के प्रयोग को रोकने के बाद, कुछ अन्य रसायन जैसे HCFCs (हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन) और HFCs (हाइड्रोफ्लोरोकार्बन) का इस्तेमाल बढ़ा, जिनसे ओज़ोन परत के नुकसान की संभावना बनी रही।

3. नाइट्रस ऑक्साइड्स (NOx): नाइट्रस ऑक्साइड्स, जो मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र, औद्योगिक प्रदूषण और वाहनों से निकलते हैं, ओज़ोन परत के अवक्षय में योगदान करते हैं।

4. प्राकृतिक कारण: प्राकृतिक कारणों में ज्वालामुखी विस्फोट और कुछ प्रकार के बायो-केमिकल प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जो ओज़ोन परत को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, इनका प्रभाव मानवीय गतिविधियों के मुकाबले बहुत कम होता है।

ओज़ोन परत के अवक्षय के प्रभाव:

1. स्वास्थ्य पर प्रभाव:

  1. त्वचा कैंसर: ओज़ोन परत का अवक्षय अधिक UV-B किरणों को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने देता है, जो त्वचा कैंसर (खासकर मेलानोमा) के जोखिम को बढ़ाता है।

  2. आँखों की समस्याएँ: अत्यधिक UV विकिरण से मोतियाबिंद और अन्य नेत्र समस्याएँ हो सकती हैं।

  3. प्रतिरक्षा प्रणाली पर असर: UV विकिरण का प्रभाव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकता है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

2. पारिस्थितिकी/ पारितंत्र पर असर:

  1. पौधों पर असर: UV विकिरण से पौधों के विकास में रुकावट सकती है, खासकर उन पौधों पर जो जलवायु परिवर्तन से पहले ही प्रभावित होते हैं।

  2. समुद्री पारिस्थितिकी: समुद्री पारितंत्र में शैवालों और अन्य जलजीवों पर UV विकिरण का प्रभाव पड़ सकता है, जिससे खाद्य श्रृंखला में असंतुलन हो सकता है।

3. जलवायु परिवर्तन पर असर: ओज़ोन परत का अवक्षय वैश्विक जलवायु परिवर्तन में भी योगदान कर सकता है। इसका प्रभाव मौसम और वातावरण के विभिन्न पैटर्न पर पड़ता है।

ओज़ोन परत के संरक्षण के उपाय:

1. मोंट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol): 1987 में, मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया था, जिसमें दुनिया भर के देशों ने CFCs और अन्य ओज़ोन-क्षयक रसायनों का उत्पादन और उपयोग कम करने का संकल्प लिया। इसके परिणामस्वरूप ओज़ोन परत की स्थिति में सुधार देखा गया है।

2. क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) का उपयोग कम करना: CFCs और अन्य ओज़ोन-क्षयक रसायनों का उत्पादन और उपयोग अब दुनिया भर में नियंत्रित किया गया है, जिससे ओज़ोन परत को बचाने में मदद मिली है।

3. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: ओज़ोन परत को बचाने के लिए, यह आवश्यक है कि हम प्रदूषण को नियंत्रित करें और पर्यावरण को संरक्षित रखें।